क्या आप जानते हैं FIR से जुड़ी ये बातें, कहीं आप भी तो नहीं हैं इन गलतफहमियों के शिकार 

First Information Report: FIR यानी फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट (First Information Report) अर्थात किसी भी अपराधिक घटना की प्राथमिक सूचना. सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इसे मैंडेटरी भी बनाया है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि किसी भी थाने में अपराध प्रभावित अथवा पीड़ित व्यक्ति के शिकायत करने पर थाना प्रभारी को तत्काल FIR दर्ज करके आगे की कार्रवाई करनी चाहिए. FIR किसी भी थाने में दर्ज कराई जा सकती है. हालांकि, पुलिस (Police) अक्सर पीड़ितों को ये कहकर टरका देती है कि अपराध (Crime) उनके थानाक्षेत्र में नहीं हुआ है इसलिए पीड़ित व्यक्ति को अपने नजदीकी थाने (Police Station) यानी जहां पर वो रहता है या फिर उस थाने में जिसके क्षेत्र में वो अपराध का शिकार बना है, FIR दर्ज करानी चाहिए. 

सबसे पहले करना होता है ये काम 
FIR दर्ज कराने के लिए पीड़ित व्यक्ति को एक कागज पर अपने साथ हुई घटना का पूरा विवरण लिखना होता है. विवरण में अपराध की जानकारी, अपराधिक घटना कब, कहां और किस वक्त हुई, इसकी जानकारी के अलावा आरोपी व्यक्ति का नाम-पता भी लिखना होता है. अगर आरोपी व्यक्ति का नाम या पता नहीं मालूम है तो उसकी गाड़ी का नंबर या मोबाइल फोन नंबर जैसी अन्य जानकारियां प्रार्थनापत्र में लिखकर अज्ञात आरोपी का जिक्र किया जाता है. 

देनी होती है पूरी जानकारी 
अंत में प्रार्थनापत्र या तहरीर पर पीड़ित के हस्ताक्षर किए जाते हैं. ऐसी समस्त जानकारियों वाले प्रार्थनापत्र को लेकर पीड़ित व्यक्ति को संबंधित पुलिस थाने जाना होता है. थाने पर थाना प्रभारी अथवा ड्यूटी पर मौजूद पुलिस अधिकारी को अपना शिकायती प्रार्थनापत्र अथवा तहरीर देनी होती है. पीड़ित की तहरीर पर थाना प्रभारी FIR दर्ज करने के लिए अपने स्टाफ को आदेश देते हैं. तहरीर के आधार पर ही थाने की जनरल डायरी में FIR दर्ज कर कर उस पर आरोपी के खिलाफ नियमानुसार आईपीसी की धाराएं शामिल की जाती हैं. किसी आपराधिक घटना पर अगर पीड़ित FIR कराने की स्थिति में नहीं है तो पुलिस अपनी तरफ से भी FIR दर्ज करा सकती है.

कानून के जानकार या फिर वकील की मदद से ड्राफ्ट करानी चाहिए FIR
FIR किसी भी अपराध के लिए कानूनी कार्रवाई का सबसे पहला दस्तावेज होता है इसीलिए इसे बहुत सोच-समझकर और सावधानी से ड्राफ्ट करना चाहिए. कानून के जानकारों का कहना है कि घटना होने के बाद जितनी जल्दी से जल्दी FIR दर्ज कराई जाए, उतना बेहतर रहता है. पीड़ित व्यक्ति FIR में अपने साथ हुई आपराधिक घटना और आरोपी के बारे में जो-जो जानकारियां देता है, उसी पर पुलिस चार्जशीट तैयार करके कोर्ट में दाखिल करती है और उसी चार्जशीट पर कोर्ट सुनवाई करके अपना अंतिम निर्णय सुनाती है. अगर FIR दर्ज करने में जरा भी लापरवाही या गड़बड़ी हो जाती है तो इसका खामियाजा पीड़ित को उठाना पड़ता है. उसे अपने साथ हुई आपराधिक घटना का उचित न्याय नहीं मिल पाता, इसलिए बेहतर माना जाता है कि FIR दर्ज कराने के लिए किसी कानून के जानकार अथवा वकील की मदद ले ली जाए.

शिकायतकर्ता वापस भी ले सकते हैं अपनी FIR
FIR वापस भी ली जा सकती है, बशर्ते पुलिस ने FIR पर चार्जशीट तैयार करके उसे कोर्ट में दाखिल ना किया हो. FIR वापस लेने के लिए पीड़ित व्यक्ति को संबंधित थाना प्रभारी को एक प्रार्थनापत्र देना होता है. अगर पुलिस FIR वापस करने से मना कर देती है तो पीड़ित व्यक्ति कोर्ट के जरिए इसे वापस ले सकता है.

कोर्ट से कराई जा सकती है FIR
FIR दर्ज करने में पुलिस की हीलाहवाली सभी जानते हैं. अधिकतर मामलों में पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए थाने आए पीड़ितों को टरका देती है. ऐसे में पीड़ित कोर्ट की शरण ले सकते हैं. सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत पीड़ित अपनी FIR दर्ज करा सकते हैं. इसके लिए पीड़ितों को कोर्ट में एक प्रार्थनापत्र देना होता है. कोर्ट में पीड़ित को ये बताना होता है कि उसने पुलिस अधिकारियों और संबंधित थाने में लगातार संपर्क कर प्रार्थनापत्र दिए लेकिन FIR दर्ज नहीं की गई. इसके बाद कोर्ट पीड़ित के प्रार्थनापत्र के आधार पर संबंधित पुलिस अधिकारियों अथवा थाना प्रभारी से आख्या मांगता है या फिर सीधे FIR दर्ज करने का आदेश जारी करता है.

FIR होने पर भी जा सकते हैं देश से बाहर
FIR को लेकर लोगों में गलतफहमियां भी हैं. कहा जाता है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होती है उसे देश से बाहर जाने की अनुमति नहीं होती, उसका वीजा या पासपोर्ट नहीं बनता अथवा अन्य कानूनी दिक्कतें आती हैं. हालांकि, ऐसा नहीं है. जो व्यक्ति आदतन अपराधी है, यानी जिसके खिलाफ गंभीर धाराओं के कई मुकदमे दर्ज हैं और वो जेल भी जा चुके हैं, उनके लिए ऐसे नियम बनाए गए हैं. जिन लोगों पर मामूली मारपीट या छोटे-मोटे अपराध की FIR होती है और पुलिस की तरफ से ऐसे लोगों का चालान नहीं किया जाता या उन्हें गिरफ्तार करके जेल नहीं भेजा जाता, ऐसे लोगों पर ये नियम लागू नहीं होता.

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