Jagannath Yatra : क्यों निकाली जाती है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, क्या है खासियत

Jagannath Yatra : पौराणिक कथाओ के आधार पर कई लोगों का मानना है कि श्रीकृष्ण की बहन एक बार सुभद्रा अपने मायके लौटती हैं तो अपने भाइयों कृष्ण और बलराम से नगर भ्रमण की इच्छा जताती हैं, तब कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के साथ रथ से नगर घूमने जाते हैं, तभी से रथ यात्रा का प्रारंभ माना गया है.

दूसरी किवदंती है कि गुंडीचा मंदिर स्थित देवी श्रीकृष्ण की मौसी हैं, यह तीनों भाई-बहन को अपने घर आने का निमंत्रण देती है. ऐसे में श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के साथ मासी के घर 10 दिन आए हैं.

तीसरी किवदंती है कि श्रीकृष्ण के मामा कंस उन्हें मथुरा बुलाते हैं. इसके लिए कंस गोकुल में सारथि के साथ रथ भिजवाता है. कृष्ण भाई बहन के साथ रथ से मथुरा जाते है, तब से रथ यात्रा की शुरुआत हुई. हालांकि, कुछ लोग यह भी मानते हैं कि इस दिन कृष्ण ने कंस का वध किया था और बड़े भाई बलराम के साथ प्रजा को दर्शन देने के लिए मथुरा में रथ यात्रा की.

चौथी किवदंती के मुताबिक कृष्ण की रानियाां माता रोहिणी से रासलीला सुनाने को कहती हैं. माता को लगता है कि कृष्ण की गोपीयों के साथ रासलीला के बारे सुभद्रा को नहीं सुनना चाहिए, इसलिए वो उसे कृष्ण, बलराम के साथ रथ यात्रा पर भेज देती हैं. तभी वहां नारदजी आते हैं और तीनों को साथ देखकर खुश हो जाते हैं. प्रार्थना करते है कि तीनों के दर्शन ऐसे हर हर साल हों. तब से तीनों के दर्शन होते हैं.

कृष्ण का शव लेकर समंदर में कूद जाते हैं बलराम-सुभद्रा
कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की मौत के बाद उनका पार्थिव शरीर द्वारिका लाया जाता है तो बलराम भाई की मृत्यु से दुखी होकर कृष्ण के शरीर समेत समुद्र में कूद जाते है, पीछे-पीछे सुभद्रा भी कूद जाती है. इस दौरान भारत के पूर्व स्थित पुरी के राजा इंद्रद्विमुना को सपना आता है कि कृष्ण का शरीर समुद्र में तैर रहा है, उसे यहां कृष्ण की विशाल प्रतिमा बनवानी चाहिए और मंदिर बनवाना चाहिए. स्वप्न में देवदूत बताते हैं कि कृष्ण के साथ, बलराम, सुभद्रा की लकड़ी की प्रतिमा बनाएं और श्रीकृष्ण की अस्थियों को प्रतिमा के पीछे छेद कर रखा जाए.

अधूरी मूर्ति छोड़कर चले जाते हैं विश्वकर्मा
राजा का सपना सच होता है और समुद्र से कृष्ण की अस्थियां मिल गईं. वह सोच रहा था कि उनकी प्रतिमा कौन बनाएगा. मभी शिल्पकार विश्वकर्मा बढ़ई के रूप में आते है लेकिन काम से पहले सभी केा चेताते हैं कि उन्हें काम के वक़्त परेशान नहीं किया जाये, नहीं तो वे बीच में काम छोड़ कर चल देंगे. कुछ माह बाद भी मूर्ति नहीं बन पाई तो उतावली के चलते राजा इन्द्रद्विमुना उनके कमरे का दरवाजा खोल देते है, ऐसा होते ही विश्वकर्मा गायब हो जाते है. मूर्ति उस समय पूरी नहीं बन पाती है, लेकिन राजा ऐसे ही मूर्ति स्थापित कर देते है, वो पहले मूर्ति के पीछे कृष्ण की अस्थियां रखकर मंदिर में विराजमान कर देते हैं. 

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