चातुर्मास में क्या करना चाहिए और क्या नहीं, जानिए

Chaturmas : हिन्दू धर्म में चातुर्मास अवधि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चलता है. ‘चातुर्मास’ को व्रत, भक्ति और शुभ कर्म के लिए माना जाता है. चातुर्मास श्रावण, भाद्रपद, आश्‍विन और कार्तिक माह हैं. चातुर्मास की शुरुआत का दिन देवशयनी एकादशी कहा जाता है तो अंत का दिन ‘देवोत्थान एकादशी’ कहते हैं.

ध्यान-साधना के लिए शारीरिक-मानसिक स्थिति सही होने के साथ संसारिक वातावरण भी अच्छा रहता है. इन चार माह को व्रत के महीने भी कहते हैं, क्योंकि इस दौरान पाचनशक्ति कमजोर रहती है. भोजन-पानी में बैक्टीरिया भी बढ़ जाते हैं.  इनमें पहला महीना बेहद महत्वपूर्ण है. संभव हो तो पूरे महीने व्रत रखना चाहिए. इस दौरान फलाहार कर सकते हैं या सिर्फ पानी पीकर ही समय गुजारा जा सकता है. इस महीने में शास्त्रों में लिखित बातों का पूरी तरह पालन जरूरी है. 

इनका पालन जरूरी
फर्श पर सोना और सूर्योदय से पहले उठना, बहुत शुभदायक है. उठने के बाद ठीक से स्नान कर अधिकांश समय मौन रहना चाहिए. साधुओं के नियम और कड़े होते हैं, उन्हें दिन में सिर्फ एक ही बार भोजन करना होता है.

ये काम न करें
इन चार महीनों में विवाह संस्कार, जातकर्म संस्कार, गृह प्रवेश आदि सभी मंगल कार्य निषेध हैं. चातुर्मास में इन्हें भूलकर न कराएं.

व्रत में ये खानपान वर्जित
इस व्रत में दूध, चीनी, दही, तेल, बैंगन, पत्तेदार सब्जियां, नमकीन या मसालेदार भोजन, मिठाई, सुपारी, मांस और मदिरा का प्रयोग नहीं करना है. माहवार की बात करें तो श्रावण में पत्तेदार सब्जियां, पालक, साग इत्यादि. भाद्रपद में दही. आश्विन में दूध, कार्तिक में प्याज, लहसुन और उड़द दाल आदि त्याग देना चाहिए.

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