कोरोना काल में दवाई-ऑक्सीजन दिलाने के नाम पर लोगों से करते थे ठगी, गैंग को मुंबई पुलिस ने पकड़ा

मुंबई: मुंबई क्राइम ब्रांच की साइबर सेल ने एक ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है जो लोग करोना काल में जरूरतमंदों को अत्यावश्यक चीजें दिलवाने के नाम पर ठगा करते थे. क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट कमिश्नर मिलिंद भारम्बे ने बताया की अब तक की जांच में पता चला है कि इन्होंने भारत में 250 के करीब लोगों के साथ ठगी की है, जिसने उन्होंने 60 लाख से ज्यादा की रकम कमाई है.

भारम्बे ने बताया की 16 जून को साइबर पुलिस बिकेसी को एक शिकायत मिली थी. शिकायतकर्ता ने बताया की उसे रेमडेसिविर नाम की दवाई की बहुत जरूरत थी और वो मार्केट में आसानी से नहीं मिल रही थी. उस समय उसने सोशल मीडिया पर देखा की इस तरह की दवाई चाहिए तो वहां पर लिखे मोबाइल पर संपर्क करें. जब इसने संपर्क किया तो सामने वाले शख्स ने पूरी तरह विश्वास दिलाया की घबराने की जरूरत नहीं है. रेमडेसिविरी वो दिलवाएगा.

इसके बाद उसने इससे पैसे लिए और कई दिनों तक टालता रहा और फिर इसे समझ आया की वो एक ठग था. जिसके बाद इसने शिकायत दर्ज कराई. भारम्बे ने बताया कि इस शिकायत के मिलने के बाद हमें लगा कि यह कोई बड़ी गैंग हो सकती है जो पैन इंडिया लेवल पर लोगों की मजबूरी का फायदा उठा रही है.

हिरासत में 6 लोग

उन्होंने बताया कि गिरफ्तार आरोपी हमेशा अपने नंबर बदल लेते थे. बैंक अकाउंट बदले जाते थे, जिस वजह से महीने लग गए इनका पता लगाते लगाते और फिर हमें पता चला कि ये आरोपी बिहार राज्य के बिहार शरीफ इलाके में बैठकर लोगों से ठगी कर रहे हैं. इसके बाद साइबर अधिकारी अल्का जाधव अपनी टीम के साथ वहां पहुंची और छापेमारी कर 6 लोगों को अपने हिरासत में ले लिया.

जांच के दौरान पता चला कि इन आरोपियों ने सिर्फ दवाई ही नहीं, बल्कि हर उस आवश्यक चीज को लोगों को देने का आश्वासन किया, जिसकी जरूरत कोरोना काल में हर किसी को थी. जांच में यह भी सामने आया है कि ये आरोपी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने ने के लिए स्पेशल मीडिया का सहारा लेते थे. ये लोग मदद करने के नाम से ट्विटर, फेसबुक और दूसरी सोशल मीडिया साइट्स पर पोस्ट करते थे और इसे ज्यादा से ज्यादा वायरल करते थे ताकि जितना हो सके उतने लोगों तक पहुंचा जा सके. ये लोग अपने पोस्ट पर लिखते थे, ‘अगर किसी को दवाई, ऑक्सीजन या अस्पताल में बेड की जरूरत होतों वो दिए नंबर पर सम्पर्क करें.’

जिसके बाद उन्हें जरूरतमंदों के फोन आते थे और ये लोग मदद करने के नाम पर लोगों को ठगना शुरू कर देते थे. जांच में पता चला कि ये आरोपी पैसे मंगाने के लिए 32 से ज्यादा बैंक अकाउंट का इस्तेमाल करते थे, जिसे फिलहाल फ्रिज कर दिया गया है. इसके अलावा फर्जी दस्तावेज के सहारे आरोपियों ने 100 से ज्यादा सिम कार्ड्स कोलकाता से खरीदे थे, जिसका इस्तेमाल कर ये लोग जरूरतमंदों से बातचीत करते थे और उन्हें ठगा करते थे.

भारम्बे ने बताया की ये आरोपी बकायदा कॉल सेंटर चलाया करते थे. जहां बैठकर ये लोगों से संपर्क किया करते थे. इनका ऑफिस किसी बड़े कॉर्पोरेट बिल्डिंग में नहीं था बल्कि ठगी का धंधा गांव के इलाके में छोटे से घरों से चलता था. इतना ही नहीं, कुछ कॉल सेंटर पेड़ के नीचे भी चलाए जाते थे, खुले आसमान के नीचे.

बचने का नायाब तरीका

ये लोग एंब्यूलेंस, अस्पताल में बेड दिलाने, रेमडेसिविर-ब्लैक फंगस की दवाई दिलाने, ऑक्सीजन, ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर जैसी चीजों को दिलाना के नाम से लोगों को ठगा करते थे. इनका ठगी का अमाउंट काफी छोटा होता था, जैसे कि 10 हजार, 15 हजार तो कभी 20 हजार होता था. इनको पता था कि अगर ठगी की राशि छोटी होगी तो लोग शिकायत करने पुलिस स्टेशन नहीं जाएंगे और गए भी तो पुलिस इतने छोटे मामले की जांच में ज्यादा समय नहीं लगाएगी लेकिन यहां उनका दांव उल्टा हो गया और वो सलाखों के पीछे चले गए.

गिरफ्तारी आरोपी काफी पढ़े लिखे थे. इस वजह से उन्हें बातचीत करने और आवश्यक वस्तु के बारे में काफी अच्छी समझ है और यही वजह है कि वो लोगों को बड़ी आसानी से अपनी बातें में उलझा लेते थे. गिरफ्तार आरोपी में बीटेक, बीएससी, साइंस के विद्यार्थी हैं. जांच में पता चला कि गिरफ्तार आरोपी कोरोना से पहले लोन दिलाने के नाम पर लोगों से ठगी करते थे लेकिन कोरोना काल में लोगों ने लोन लेना कम कर दिया था और इसी वजह से जब भी यह लोगों को लोन के लिए फोन करते थे तो सामने से लोग ना ज्यादा कहते थे. इसी बीच उन्होंने देखा की लोगों को अब दवाई, ऑक्सीजन, अस्पताल में बिस्तर की ज्यादा जरूरत है तब जाकर इन लोगों ने उसे ठगी का नया पैंतरा बना लिया.

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Source link ABP Hindi


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