The House of Scindias: 300 सालों की एक रोचक कहानी, लेखक रशीद किदवई से खास बातचीत

The House of Scindias: राजा रानी की कहानियां हमेशा दिलचस्प होती हैं और ऐसे में अगर राजा रानी जाने पहचाने हों तो पढने और सुनने में और मजा आता है. जाने माने राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार रशीद किदवई की नई किताब ‘The House of Scindias’ सिंधिया राजघराने का एक रोचक दस्तावेज है, जिसमें आजादी के पहले से लेकर आजादी के 75 साल तक तकरीबन 300 सालों की कहानी है.

इस किताब में सिंधिया खानदान के बनने और देश की राजनीति में छाने तक की कहानी है. किसी किरदार को नहीं छोडा गया है. सिंधिया घराने के संस्थापक रानो जी राव शिंदे से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया तक से जुडी बातें इस किताब में रोचक तरीके से बताई गई हैं.

लेखक रशीद किदवई से खास बातचीत

इस देश में अनेक राजघराने हैं, मगर आपने सिंधिया राजघराने पर ही लिखने की क्यों सोची? क्या खास है सिंधिया घराने में?

सिंधिया राजघराना एकमात्र ऐसा घराना है, जिसमें 1730 से लेकर आज तक परिवार के लोग सार्वजनिक जीवन में है. पहले राजा बन कर साम्राज्य चलाया फिर आजादी मिली तो जनसेवक बन गये. सिंधिया घराने के आखिरी शासक जीवाजी राव सिंधिया आजादी के बाद से 1956 तक अपने राज्य के गवर्नर बन कर रहे और 1957 में विजयाराजे सिंधिया पहली बार सांसद बनीं. उसके बाद से अब तक इस परिवार का कोई ना कोई सदस्य लोकसभा राज्यसभा या फिर विधानसभा में इस घराने का प्रतिनिधित्व आज तक करता रहा और ऐसा उदाहरण देश में ही नहीं दुनिया में नहीं मिला कि 300 साल से ज्यादा वक्त तक किसी घराने के लोग सार्वजनिक जीवन में सक्रियता से शामिल रहे हों.

रशीद जी आप भी मानेंगे कि सिंधिया घराने पर लिखना आसान नहीं है, क्योंकि इनका इतिहास में 1857 के दौर में आजादी की लड़ाई का पहलू विवादास्पद रहा है, जब सिंधिया घराने ने अंग्रेजों का साथ दिया था. आपने उसको कैसे लिखा और संभाला.

हम लेखक तथ्यों के आधार पर ही सारी बातें लिखते हैं और हम जानते हैं कि इतिहास में उतार चढाव होते हैं, इतिहास में उजला और स्याह दोनों पहलू होते हैं. स्याह पहलू को छिपाने से कुछ नहीं होता और 1857 की आजादी की लडाई में सिंधिया घराने ने जो किया था, उस दौर को मुझे वसुंधरा राजे सिंधिया के एक वाकये से बड़ा हौसला मिला. बहुत साल पहले वसुंधरा जब इंदौर में लक्ष्मीबाई की प्रतिमा का उदघाटन करने गयीं थीं तो वहां उनका विरोध हुआ और वसुंधरा ने वहां पर मंच से बहुत अच्छे से तरीके से विरोध करने वालों को समझाया था कि इतिहास की गलतियों को कब तक ढोया जायेगा. जो हुआ उस पर उन्होंने अफसोस भी जताया. इसलिये मैंने इतिहास के तथ्यों को ईमानदारी से सामने रखा.

किताब में आपने लिखा है कि सिंधिया घराने ने कभी बेवजह राजा होने का गर्व नहीं पाला. सूर्यवंशी और चंद्रवंशी कहने के जगह विनम्रता से आपने इतिहास और पूर्वजों की बातें सामने रखीं. ये क्या है?

ये भी दिलचस्प किस्सा है. सिंधिया घराने के पहले शासक रानोजी राव सिंधिया पेशवा बाजीराव के अर्दली थे. पेशवा उनका नाम भी नहीं जानते थे. मगर एक दिन पेशवा ने देखा कि उनका अर्दली उनके जूते सीने से लगाये सो रहा है. नाराज होकर उन्होंने उसे जगाया तो रानोजी राव ने बताया कि हुजूर आपके जूते में कोइ जहर ना डाल दे इसलिये मैं इनको अपने साथ सीने से लगाकर सो गया. पेशवा इससे खुश हुये और फिर रानो जी राव को सामंत बना दिया. रानोजी ने पहले उज्जैन फिर ग्वालियर को अपनी राजधानी बनाया और शिंदे से सिंधिया बन गये. इस बात को किसी सिंधिया शासक ने छिपाया नहीं और वो मानते रहे कि कैसे उनके पूर्वज यहां तक पहुंचे.

आपने इस किताब में रानोजी राव से लेकर जीवाजीराव और विजयाराजे माधवराव ओर ज्योतिरादित्य सिंधिया तक का सफर लिखा है. किसका व्यक्तित्व और संघर्ष सब पर भारी है?

ये कहना बड़ा मुश्किल है कि कौनसा सिंधिया शासक का संघर्ष सबसे कठिन था. सभी ने अपने को वक्त परिस्थिति के हिसाब से बहुत बदला मगर विजयाराजे सिंधिया इन सबमें अलग थीं. वो किसी बड़े राजघराने से नहीं थी. उनका नाम लेखा था, मगर सिंधिया परिवार में आकर पुरूष प्रधान समाज में उन्होंने विजयाराजे के नाम से अपनी जगह बनायी. वो आजादी के पहले तक महारानी थीं फिर आजादी के बाद राजनीति में आयीं कांग्रेस की सांसद बनीं. बाद में इंदिरा गांधी से नाराज होकर जनसंघ से जुडी और बाद में बीजेपी को आर्थिक सहारा देकर बडा किया. ये कठिन काम था. उनके अपने बेटे माधवराव से इसी बात का झगड़ा था कि वो समझते थे कि उनकी मां जनसंघ और बीजेपी पर पैसा लुटा रहीं हैं.

राजे महाराजे की कहानी लिखने में बहुत सारे किस्से कहानियां सुने सुनाये होते हैं. आपने उनको किस आधार पर कैसे लिया और सिंधिया परिवार के बहुत सारे सदस्य आज भी सक्र्रिय राजनीति में हैं, उनकी नाराजगी का डर नहीं लगा आपको?

ये सच है कि बहुत सारे किस्से सिंधिया घराने को लेकर प्रचलित हैं, मगर मैंने उन किस्सों को जब इतिहास की किताबों और दूसरे दस्तावेजों में देखा तभी उसका उल्लेख किया, वरना बहुत सारी बातों को छोड़ा भी है और मेरी ये किताब पहले लिखी किताबों और दस्तावेजों पर आधारित है. फिर मैंने इसे साक्षी भाव से लिखा है, इसलिये मुझे नहीं लगता कि सिंधिया परिवार का कोई सदस्य इससे नाराज होगा. इस किताब की बिक्री बता रही है कि ये किताब लोगों को पसंद भी आ रही है.

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