क्या भारत में जानवरों से पहले इंसानों पर हो रहा वैक्सीन ट्रायल, जानें दिग्विजय सिंह के आरोपों पर AIIMS के डॉक्टर क्या बोले

नई दिल्ली: कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने आरोप लगाया है कि भारत में कोरोना के खिलाफ तैयार की जा रही वैक्सीन को जानवरों पर ट्रायल किए बिना सीधे इंसानों को दिया जा रहा है. वहीं, हरियाणा के मंत्री विज ने शोहरत पाने के लिए वैक्सीन लिया, उनको कोविड हो गया. इस पर डॉक्टरों और जानकारों का कहना है की भारत में दुनिया के बाकी देश और मेडिकल साइंस के मुताबिक ही ट्रायल की प्रक्रिया की जा रही है. वहीं किसी को वैक्सीन मिल भी जाए तो संक्रमित या बीमार नहीं होगा, ऐसा नहीं होता है. वैक्सीन लगने के बावजूद ऐसा हो सकता है.

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा “हरियाणा के मंत्री विज साहब ने शोहरत पाने के लिए वैक्सीन ली, उनको कोविड हो गया. ये नया रोग है…इंसानों से पहले जानवरों पर ट्रायल होता है खैर यहां सीधा इंसानों पर हो रहा है. लेकिन सावधानी बरतने की जरुरत है, क्योंकि किसी वैक्सीन के लिए भारत प्रयोगशाला नहीं.”

दिग्विजय सिंह के मुताबिक भारत में वैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल के नियमों का पालन नहीं हो रहा है. वैक्सीन लाने की जल्दबाजी में ऐसा हो रहा है. इसी जल्दबाजी में और शोहरत के लिए हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने ये वैक्सीन ली, लेकिन बावजूद इसके वो कोरोना पॉजिटिव हो गए.

लेकिन क्या वाकई में ऐसा है? इस बारे में एबीपी न्यूज़ ने एम्स कम्युनिटी मेडिसिन के डॉक्टर पुनीत मिश्रा से बात की. उनसे पूछा कि आखिर कैसे होता है किसी भी वैक्सीन का ट्रायल और क्यों हुआ होगा अनिल विज को वैक्सीन लगने के बाद भी कोरोना? डॉ पुनीत मिश्रा ने सबसे पहले हमें साफ कहा की वैक्सीन क्लीनिकल ट्रायल की अपनी प्रक्रिया है जो पूरी दुनिया में हर जगह एक जैसी है और मेडिकल साइंस के मुताबिक है.

एम्स के कम्युनिटी मेडिसिन के डॉ पुनीत मिश्रा ने क्लीनिकल ट्रायल के बारे में पूरी प्रक्रिया बताई, उन्होंने बताया, “वैक्सीन का जब ट्रायल होता है तो उसके अलग-अलग चरण होते हैं. सबसे पहला ट्रायल जो है वो लैब में किया जाता है और वह जानवरों पर किया जाता है. जब एनिमल्स स्टडी हो जाती है, तब ह्यूमन ट्रायल का नंबर आता है. ह्यूमन ट्रायल में भी अलग-अलग चरण होते हैं. पहले चरण में हम सेफ्टी को देखते हैं, सेफ्टी मतलब जो दवा तैयार हुई है, कहीं उसका कोई साइड इफेक्ट तो नहीं है और इसमें हम हेल्थ वॉलिंटियर लेते हैं और वॉलिंटियर्स की संख्या कम होती है, 10 से 50 तक.”

पुनीत मिश्रा ने कहा, “हो सकता है कि उस दौरान पता चले कि इसमें कोई साइड इफेक्ट है किसी को किसी तरह की तकलीफ हो, किसी की मौत हो जाए तो जब इसमें देख लेते हैं. पहले चरण में कि किसी तरह का साइड इफेक्ट नहीं है और साथ ही में देखते हैं कि इम्यूनोजेनिसिटी है या नहीं. जब यह पहले दो चरण सफल होते हैं तब हम तीसरे चरण के ट्रायल में जाते हैं और इस ट्रायल में हजारों की संख्या में वॉलिंटियर नियुक्त किए जाते हैं. बड़े सैंपल लिए जाते हैं. इस वाले ट्रायल में हम सभी लोगों को लेते हैं. यानी जरूरी नहीं है कि सेहतमंद लोगों को ही लेना है. और इसके जो नतीजे आते हैं और जब सब कुछ सही होता है तो वैक्सीन को लाइसेंस किया जाता है. तो इस दौरान हम सेफ्टी देखते हैं, एफीकेस भी देखते हैं, इम्यूनोजेनिसिटी भी देखते हैं, सब चेक कर लेते हैं. इसके बाद नंबर आता है फेस 4 ट्रायल का और यह ट्रायल पोस्ट मार्केटिंग (post-marketing) होता है. इसमें लॉन्ग टर्म साइड इफैक्ट्स देखे जाते हैं.”

डॉ पुनीत मिश्रा ने इस बारे में एबीपी न्यूज़ से साफ कर दिया कि प्रक्रिया क्या है और भारत में भी इसी प्रक्रिया के जरिए ही कोई भी क्लीनिकल ट्रायल होता है. ये सभी ट्रायल चार चरण में होते हैं और हर चरण की रिपोर्ट आने के बाद अगले चरण की अनुमति मिलती है. यानी जब एनिमल स्टडी पूरी हो जाए और उसकी एनालिसिस रिपोर्ट जमा होगी और संतोषजनक रिपोर्ट होने पर आगे के ट्रायल के लिए अनुमति मिलती है. वहीं ये सभी क्लीनिकल ट्रायल ब्लाइंड और डबल ब्लाइंड यानी जो दवा या वैक्सीन दी जा रही है उसके लिए मेडिकल साइंस की खास प्रक्रिया है.

इस बारे में डॉ पुनीत मिश्रा का कहना है, “कुछ स्टडी सिंगल ब्लाइंड होती है, कुछ डबल ब्लाइंड होती हैं और कुछ ट्रिपल ब्लाइंड होती हैं. इसका मतलब यह हुआ कुछ स्टडी में जो वॉलिंटियर हैं, उसे नहीं पता कि वह किस ग्रुप में हैं, दवाई वाले ग्रुप में है या प्लेसिबो वाले ग्रुप में है. डबल ब्लाइंड में इन्वेस्टिगेटर को भी नहीं पता होता कि क्या दिया जा रहा है. प्रक्रिया में जो एनालिसिस करते हैं, उन्हें भी नहीं पता होता. जब आपकी सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है और एनालिसिस हो जाती है तो कोड को डिकोड किया जाता है और यह देखा जाता है कि किसको क्या मिला था. फिर हम उसकी तुलना करते हैं और देखते हैं कि उसकी एफीकेसी प्लेसिबो वाले में और वैक्सीन में कैसी है. उसके बाद ही अंदाजा लगता है कि यह वैक्सीन कितनी सुरक्षित है, कितना कारगर है और उससे क्या साइड इफेक्ट हैं. सारी चीज पता चलती है.”

वहीं, इस हरियाणा के मंत्री अनिल विज के वैक्सीन ट्रायल में शामिल होने और वैक्सीन लगने के बाद भी उन्हें कोरोना होने पर डॉक्टरों का कहना है की वो क्लीनिकल ट्रायल में शामिल हुए थे और उन्हें वह वैक्सीन मिली थी या प्लेसिबो ये कोई भी अभी नहीं बता सकता है. वहीं, दूसरी बात कि अगर वैक्सीन मिली होगी तो तुरंत उसका असर नहीं होता है और इसमें कुछ वक्त लगता है. वहीं इस वैक्सीन के दो डोज के बाद ही अच्छे असर मिलते हैं.

डॉ पुनीत मिश्रा ने कहा, “इसमें कई सारी संभावनाएं हो सकती हैं. पहली चीज तो यह हमें नहीं पता कि उन्हें वैक्सीन दी गई है या प्लेसिबो दिया गया. अगर उन्हें प्लेसिबो दिया गया था तो जो किसी साधारण व्यक्ति को दुख होता है वह उनको भी होगा. दूसरी संभावना यह है कि अगर उन्हें वैक्सीन मिली भी है, तो उसमें इम्यूनिटी आने में वक्त लगता है. तीसरी संभावना यह है कि वैक्सीन लगने के बाद कुछ वक्त लगता है आपके शरीर में एंटीबॉडी बने. तब तक आपको अगर इंफेक्शन हो रहा है तो उसकी संभावना बनी रहती है. पहले डोज के बाद इम्यून रिस्पॉन्स ट्रिगर होता है और उसके बाद दूसरा डोज देखकर हम उसको और स्ट्रॉन्ग बनाते हैं.”

उन्होंने कहा, “आमतौर पर हर वैक्सीन का अलग-अलग टाइम पीरियड होता है. एक और वजह हो सकती है, जिसकी संभावना है कि 2 से 7 दिन का जो समय होता है कोरोना इनफेक्शन के होने का किसी व्यक्ति के संपर्क में आने के बाद, लेकिन कुछ में यह वक्त ज्यादा भी लग सकता है. संभावना है कि जब वह बैठक में शामिल होने आए हों, तो वह इनक्यूबेशन पीरियड में रहे हों. जब इसका अध्ययन होगा तो रिपोर्ट आएगी उसके बाद ही पता चलेगा.”

वहीं एम्स के कम्युनिटी मेडिसिन के डॉ संजय राय का इस बारे में यही कहना था कि “हमें नहीं पता कि उन्हें वैक्सीन मिली थी या प्लेसिबो मिला है. अगर हम मान भी लें कि उन्हें वैक्सीन मिली भी थी, तो वैक्सीन तुरंत प्रोटेक्शन नहीं देती, वह अपना वक्त लेती है. और यह दो डोज का शेड्यूल है. अभी तो उन्हे पहली ही डोज मिली थी. तो वैक्सीन मिलने के बाद 10 दिन के अंदर प्रोटेक्शन नहीं हो सकती. यह माना जा सकता है.”

यानी साफ है कि भारत में ट्रायल के वही नियम है, जो बाकी दुनिया में है और ट्रायल की हर प्रक्रिया को किया है. किसी भी प्रक्रिया को इस दौरान नहीं छोड़ा गया फिर चाहे एनिमल ट्रायल हो या उसके बाद के ट्रायल. वहीं ट्रायल के दौरान डबल ब्लाइंड प्रक्रिया अपनाई जाती है और उसमें किसी को नहीं पता होता है कि किस वॉलंटियर को कौन सा वैक्सीन दिया जा रहा है.

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