वास्तुशास्त्र: कॉर्पोरेट मीटिंग्स में रखें इन बातों का ध्यान, चर्चा रहेगी प्रभावशाली

<p style="text-align: justify;">कारोबारी चर्चा का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन पर व्यवसाय की जरूरी योजनाओं पर चिंतन होता है. इन मीटिंग्स में वास्तु का ध्यान रखा जाना आवश्यक है. मीटिंग हॉल पूर्व दिशा और उत्तर-पूर्व दिशा में निर्मित किया जाना चाहिए. इन पूर्व दिशा में चर्चा प्रभावशाली रहती है. उत्तर पूर्व दिशा में चर्चा सुखद वातावरण में होती है. ऐसे में चर्चाओं के परिणाम भी संतोषजनक निकलते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">पूर्व दिशा को सूर्य की दिशा माना जाता है. सूर्य प्रबंधन का कारक ग्रह है. प्रबंधन और प्रशासन से जुड़े विषयों में पूर्व दिशा में चर्चा करना श्रेष्ठ फल देता है. उत्तर-पूर्व दिशा में कलात्मक और सृजनात्मक चर्चाओं को बेहतर ढंग से किया जा सकता है. मीडिया हाउस, फिल्म, धर्म, संस्कार, साहित्य और कला से जुड़े विषयों को ईशान कोण अर्थात् उत्तर-पूर्व में विचारा जाना उत्तम है.</p>
<p style="text-align: justify;">आग्नेय कोण अर्थात् उत्तर-दक्षिण में चर्चा भारी और बोझिल हो जाती है. कही गई बात सदस्यों तक ठीक से पहुंच नहीं पाती है. विरोध के स्वर उठने की संभावना रहती है. तर्क बहस बढ़ जाने से चर्चा का प्रयोजन प्रभावित हो जाता है. संस्थान के मालिक के लिए व्यक्तिगत और अत्यावश्यक चर्चाएं अपने चैंबर में दक्षिण-पश्चिम दिशा में करना शुभकर होता है. इन चर्चाओं में भाव और भाषा आदेशात्मक रहती है.</p>
<p style="text-align: justify;">पश्चिम दिशा में चर्चा में लोग उत्साह से भाग नहीं लेते हैं. नतीजतन चर्चा का उद्देश्य क्षीण हो जाता है. वायव्य कोण अर्थात् उत्तर-पश्चिम में मीटिंग्स में व्यर्थ वार्तालाप की आशंका बढ़ जाती है. विरोधी अपनी योजनाएं बढ़ाने में सफल हो जाते हैं.</p>

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