चाणक्य नीति: धैर्यपूर्वक सुनना और समझना है बड़ी योग्यता, जल्दबाजी से बिगड़ती है बात  

<p>आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य तक्षशिला से लौटकर गृह नगर पाटलिपुत्र आए तो उन्हें वहां की जानकारी लगभग न के बराबर थी. उनके पास समय कम था और कार्य ज्यादा था. उन्हें पथ भ्रष्ट सम्राट धननंद को सत्ताच्युत करना था. इसके लिए उन्हें सूचनाओं को एकत्र करना था. उन्होंने बगैर कोई प्रतिक्रिया दिए और मंतव्य जाहिए किए करीबियों, मित्रों और समर्थको धैर्य से सुनना आरंभ किया. सभी सहजता से मगध की वास्तविक स्थिति से चाणक्य को अवगत कराते रहे.</p>
<p>आचार्य चाणक्य ने उनसे सहज चर्चा की और जरूरी बातों को संचित कर लिया. इस प्रक्रिया में उन्हें लंबा समय लगा. सूचनाओं का एकत्रीकरण उनके लिए अत्यंत आवश्यक विषय था. नवीन युद्धक्षेत्र में पुराने अनुभव कार्य जरूर करते हैं लेकिन तथ्यों के नव संग्रह की आवश्यकता अनिवार्य होती है.</p>
<p>चाणक्य ने सूचनाओं के संग्रह से उचित निर्णय स्पष्ट कर अपनी योजनाओं पर अमल शुरू किया और सफलता पाई. उन्होंने अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण ल़ड़ाई मात्र बुद्धिकौशल से जीत ली. सम्राट धननंद के राज्य में रहकर उन्हें परास्त किया. धननंद को मालूम हो गया था कि यह वही ब्राह्मण जिससे उसका विवाद है. इसके बावजूद धननंद चाणक्य को तिलभर प्रभावित नहीं कर सका.</p>
<p>चाणक्य ने मगध में शिक्षकों के विद्रोह की आहट को समझा और तक्षशिला जैसी विराट पाठशाला का प्रस्ताव सत्ता और शिक्षकों के समक्ष रखा. उन्होंने राजसत्ता की प्रशासनिक खामियों को जाना और विश्वस्तों को राजप्रासाद तक पहुंचा दिया. इससे उनके लिए विद्रोह के दौरान राजप्रासाद पर नियंत्रण करना आसान रहा. &nbsp;इस प्रकार उन्होंने धैर्य पूर्वक उचित प्रकिया के साथ प्रतिक्रिया दी और सफलता पाई.</p>

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