हौसले को सलाम : गर्भवती बहन और दूसरे मरीजों की उखड़ने लगी सांसें तो देवदूत बन गए कोरोना पॉजिटिव पंकज, जानें कैसे? 

<p style="text-align: justify;">इसे हौसला और जज्&zwj;बा नहीं तो और क्&zwj;या कहें. खुद की जान पर बनी हो और गर्भवती बहन के साथ दूसरे मरीजों की जान बचाने के लिए कोई अपनी जान की बाजी लगा दे. हम आपको बताते हैं ऐसे ही देवदूत के बारे में. गोरखपुर के रहने वाले देश के असली हीरो पंकज ने अस्&zwj;पताल में बहन और अन्&zwj;य मरीजों की आक्&zwj;सीजन खत्&zwj;म होने के बारे में सुना तो कोविड पॉजिटिव होने के बावजूद पंकज अस्&zwj;पताल की एंबुलेंस ड्राइव करते हुए 50 किलोमीटर दूर से आक्&zwj;सीजन लेकर चले आए. उन्&zwj;होंने बहन और अन्&zwj;य मरीजों की जान भी बचा ली.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">पुराना गोरखपुर निवासी पंकज शुक्ला के हौसले को हर कोई सलाम कर रहा है. एक तरफ कोरोना महामारी ने रिश्तों में दूरियां ला दी हैं, वहीं खुद संक्रमित होने के बावजूद पंकज ने खुद की परवाह किए बगैर न केवल अपनी गर्भवती बहन प्रियंका द्विवेदी, बल्कि अस्पताल में भर्ती अन्य मरीजों की जान बचाई.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">पंकज बताते हैं कि 10 मई को जब दोनों भाई-बहन कोरोना से जंग जीतकर घर लौटे, तो पूरे मोहल्ले के लोगों ने फूल-मालाओं से उनका स्वागत किया. फार्मा कंपनी में रीजनल मैनेजर पद पर काम करने वाले पंकज शुक्ला पत्नी विनीता शुक्&zwj;ला, दो बेटियों वैष्&zwj;णवी-शिजी और मां के साथ पुराना गोरखपुर मोहल्ले में रहते हैं. साल 1986 में पिता का देहांत होने के बाद कम उम्र में ही उनके कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">छत्तीसगढ़ के विलासपुर में रहने वाले बहनोई के भी अकेले होने से 15 अप्रैल को घरवालों ने गर्भवती बहन प्रियंका द्विवेदी को 10 साल के बेटे मिहिर के साथ देखरेख के लिए गोरखपुर बुला लिया था. कुछ दिन बाद बहन सर्दी-जुकाम हुआ, तो उन्होंने डॉक्टर से सलाह ली. &nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">डॉक्टर ने पहले कोविड जांच कराने के लिए कहा. 12 अप्रैल को जांच कराई तो बहन पॉजिटिव निकली। इस पर पंकज ने भी जांच कराई तो वह भी संक्रमित मिले. दो दिन बाद आरटीपीसीआर की रिपोर्ट आई, तो उसमें भी दोनों पॉजिटिव मिले. दवा तब तक शुरू हो गई थी, लेकिन अचानक बहन को सांस लेने में दिक्कत होने लगी.</p>
<p style="text-align: justify;">पंकज बताते हैं कि शहर के हालात देख उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी हालत में बेड कहां मिलेगा. फार्मा लाइन के संबंध काम आए और गोरखनाथ क्षेत्र स्थित गोरखपुर हॉस्पिटल के डॉ. राजेश श्रीवास्तव ने मदद कर अपने अस्पताल में बेड दिलाया. बहन के साथ वह भी भर्ती हो गए.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">28-29 अप्रैल को शहर के ऑक्सीजन प्लांट बंद होने से अस्पताल का ऑक्सीजन खत्म होने के कगार पर पहुंच गया. अस्पताल प्रबंधन ने मरीजों के परिजनों को बताया कि अब डेढ़ घंटे का ही ऑक्सीजन उनके पास है. यह सुनकर पंकज के हाथ-पांव फूल गए. उन्होंने कई जगह फोन किया, लेकिन बात नहीं बनी. आखिर में रोने-गिड़गिड़ाने पर आरके ऑक्सीजन प्लांट के कर्मचारी ने ऑक्सीजन देने के लिए हामी भरी.</p>
<p style="text-align: justify;">पंकज बताते हैं कि शर्त रखी कि खाली ऑक्सीजन सिलिंडर लेकर आना होगा. साथ में ऑक्सीजन का पत्र भी. उन्होंने डॉक्टर को इसकी सूचना दी, लेकिन पता चला कि अस्पताल के पास जो एंबुलेंस है उसका ड्राइवर बीमार है. कुछ समझ में नहीं आया तो पंकज ने डॉक्टर से गुजारिश की. प्लांट से ऑक्सीजन सिलिंडर खुद लाने का प्रस्ताव रखा. बहुत अनुरोध के बाद अस्पताल प्रबंधन तैयार हो गया. अस्पताल के कर्मचारियों की मदद से पंकज ने खुद पांच-छह सिलिंडर एंबुलेंस में रखा. स्टाफ ने उन्हें सैनिटाइज करने के साथ ही अन्य जरूरी बचाव के इंतजाम किए.</p>
<p style="text-align: justify;">पंकज गोरखनाथ से एंबुलेंस चलाते हुए गीडा स्थित आरके ऑक्सीजन प्लांट आए और वहां से सिलिंडर भरवाकर दोबारा अस्पताल पहुंचे. इस बीच कई मरीजों के परिजनों ने फोन कर जल्द आने की गुहार लगाई. जब वह अस्पताल पहुंचे, तो मरीजों के साथ मौजूद प्रत्येक परिजन का चेहरा खिल गया. तब तक ऑक्सीजन खत्म होने वाली थी. आनन-फानन में स्टाफ ने ऑक्सीजन लगाया, जिससे पंकज की बहन समेत सभी मरीजों की उखड़ती सांसें लौट सकीं और उनकी जान बच गई. &nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">प्रियंका द्विवेदी कहती हैं कि उनकी और कुछ अन्य मरीजों की जान इसलिए बच गई, क्&zwj;योंकि उनका भाई उनके साथ रहा. उन्&zwj;होंने कहा कि उनके भाई ने हौसला नहीं दिखाया होता, तो उनके साथ अन्&zwj;य मरीजों की भी जान पर बन आती. वे कहती हैं कि कोरोना महामारी में लोग एक-दूसरे की मदद करने की बजाय पीछे हट जा रहे हैं. वे लोग एक-दूसरे की मदद करें. इससे लोगों की जान बचाने में मदद मिलेगी. भाई पंकज ने हिम्&zwj;मत दिखाई और खुद एंबुलेंस चलाकर 50 किलोमीटर ड्राइव कर गीडा से आक्&zwj;सीजन लेकर आए और उनकी और अन्&zwj;य मरीजों की जान बच गई. जब वे लोग मोहल्&zwj;ले में आए, तो उनका और उनके भाई का मोहल्&zwj;ले के लोगों ने फूल बरसाकर स्&zwj;वागत किया.</p>

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