एंबुलेंस घोटाला: एबीपी न्यूज़ की खबर का असर, शिवराज चौहान सरकार में मंत्री रहे ओम प्रकाश धुर्वे की बढ़ी मुश्किलें

एबीपी न्यूज़ के घंटी बजाओ की खबर का चार साल बाद असर हुआ है. ये खबर में जो भ्रष्टाचार हुआ है उसमें शिवराज सिंह चौहान सरकार के पूर्व मंत्री और वर्तमान में बीजेपी के सचिव और महाराष्ट्र प्रभारी ओम प्रकाश धुर्वे और उनकी पत्नी ज्योति धुर्वे की मिलीभगत सामने आ रही है. 2012-13 में दीनदयाल चलित अस्पताल योजना के नाम पर हुए एंबुलेंस घोटाले में धुर्वे दंपत्ति का नाम था, लेकिन कोर्ट के आदेश के बावजूद जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो फिर एक जनहित याचिका जबलपुर हाईकोर्ट में दायर की गई है. 

पूर्व में हाई कोर्ट ने लाखों की रिकवरी के साथ एफआईआर के आदेश भी दिए थे, लेकिन पूरा मामला इतने दिनों तक दबा रहा. लेकिन अब शासन ने कोर्ट से जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का वक्त मांगा है. 

डिंडोरी में 2012-13 में हुए चलित एम्बुलेंस घोटाले का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है. डिंडोरी के वीरेंद्र केसवानी ने एक जनहित याचिका मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच में दायर की है, जिसमें उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद इस मामले मे अब तक किसी भी तरह की कार्यवाही न होने को चुनौती दी है.

याचिका में कहा गया है कि मामले में पूर्व में हुई विभागीय जांच में लाखों के रिकवरी और FIR के आदेश भी हो चुके हैं. याचिकाकर्ता वीरेंद्र केसवानी के वकील राजेश चांद ने बताया की इस मामले के सामने आते ही कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया है और सरकार ने दो हफ़्ते का समय मांगा है.

ये पूरा मामला 2012-13 वित्तीय वर्ष से जुड़ा हुआ है. जब प्रदेश में दीनदयाल चलित अस्पताल योजना संचालित थी. योजना के तहत सरकारी अस्पतालों में किराए से ऐसी एंबुलेंस मुहैया कराई जानी थी, जो जरूरतमंदों को इलाज मुहैया कराने में सक्षम हो. इस योजना के तहत डिंडोरी की गजानन शिक्षा एवं जन सेवा समिति को ठेका दिया गया, जिसके अध्यक्ष पूर्व मंत्री ओम प्रकाश धुर्वे और सचिव उनकी पत्नी ज्योति धुर्वे थी. 

एंबुलेंस घोटाला: एबीपी न्यूज़ की खबर का असर, शिवराज चौहान सरकार में मंत्री रहे ओम प्रकाश धुर्वे की बढ़ी मुश्किलें

याचिकाकर्ता के मुताबिक, इस मामले में घपले की शिकायत के बाद जब जांच बैठाई गई तो पता चला कि एंबुलेंस के नाम पर ट्रक, फायर ब्रिगेड, स्कूल बस और ट्रैक्टर के नंबर देकर लाखों का भुगतान ले लिया गया था. इस मामले में 2013 और 2016 में तत्कालीन कलेक्टर ने रिकवरी और FIR के आदेश दिए थे. लेकिन 2016 के बाद यह फाइल बंद पड़ी हुई है. जनहित याचिका की प्राथमिक सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने हाई कोर्ट से जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय लिया है. 

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