हीरे चाहिए या ऑक्सीजन? MP में बक्सवाहा हीरा खदान को लेकर विरोध | पूरा मामला समझिए

भोपाल: मध्य प्रदेश में दुनिया का सबसे बड़ा हीरे का भंडार है. हीरे का ये भंडार छतरपुर जिले में है. लेकिन इसको लेकर अब जीवन पर खतरा मंडरा रहा है. बक्सवाहा हीरा खदान मामले में आज भोपाल की एनजीटी में सुनवाई होनी है. इस खदान की इजाज़त रद्द करने के लिए याचिका लगाई गई है. जानिए आखिर ये प्रोजेक्ट क्या है और क्यों इस प्रोजेक्ट का विरोध हो रहा है.

 2.15 लाख हरे-भरे पेड़-पौधे काटे जाएंगे

छतरपुर जिले में बकस्वाहा जंगल को हीरा खनन के लिए बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग इंड्रस्ट्रीज कंपनी को 50 साल के पट्टे पर एमपी सरकार ने दे दिया है. इसका रकबा लगभग 382.13 हेक्टेयर है. जंगल के लगभग 2.15 लाख हरे-भरे पेड़-पौधे काटे जाएंगे. इतनी बड़ी हरियाली पर मंडराते खतरे से पर्यावरण प्रेमी और उनके संगठनों ने आंदोलन छेड़ दिया है और विरोध प्रदर्शन जारी है.

बताया जाता है कि इस जंगल के बीच जमीन के नीचे करीब साढ़े तीन करोड़ कैरेट हीरे का भंडार मौजूद है. इसकी अनुमानित कीमत करीब 60 हजार करोड़ रुपए है. डायमंड माईनिंग प्रोजेक्ट के तहत इन हीरों को निकालने के लिए जंगल के करीब ढाई लाख पेड़ काटे जाएंगे. पेड़ काटकर हीरे निकालने का प्रोजेक्ट पहले साल 2000 में रियो टिंटो कंपनी को मिला था. लेकिन वह कंपनी छोड़कर चली गई. अब ये प्रोजेक्ट बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग एंड इंड्रस्ट्रीज लिमिटेड कंपनी को दिया गया है, जो इसपर काम करना चाहती है.

डायमंड माईनिंग प्रोजेक्ट में पेंच कहां फंसा है?

करीब दो साल पहले दिसंबर 2019 में मध्य प्रदेश सरकार ने इस जंगल की नीलामी की. जिसमें बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग एंड इंड्रस्ट्रीज लिमिटेड ने सबसे ज्यादा बोली लगाई. इसके बाद सरकार ने कंपनी को ये जंगल 50 साल के पट्टे पर दे दिया. हालांकि कंपनी को आने वाले पांच सालों में केंद्र सरकार के पर्यावरण और वन विभाग से जरूरी मंजूरी लेनी होगी. इस मंजूरी को लेकर ही मामला फंसा हुआ है, क्योंकि यहां के स्थानीय लोग जंगल काटने का विरोध कर रहे हैं.

…तो पानी को लेकर गहराएगा संकट!

ये बुंदेलखंड का इलाका है, जहां पहले से ही पानी की कमी है. जबकि डायमंड प्रोजेक्ट में पानी का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है. ऐसे में इलाके में पानी का संकट भी बढ़ सकता है. हालांकि कंपनी और सरकार का कहना है कि ये पेड़ एक साथ नहीं काटे जाएंगे, बल्कि 12 चरणों में काटे जाएंगे और इनकी जगह 10 लाख पेड़ भी लगाए जाएंगे.

बकस्वाहा का जंगल क्यों खास है?

दरअसल इस जगल में कई तरह के जरूरी पेड़ मौजूद हैं. यहां सागौन, बबूल, केम, पीपल, तेंदू, जामुन, बहेड़ा और अर्जुन समेत कई दुर्लभ प्रजाति के पेड़ मौजूद हैं. ये पेड़ और इनसे मिलने वाली लकड़ियां यहां के लोगों की आजीविका है. इस प्रोजेक्ट से करीब 17 गांव प्रभावित होंगे.

पन्ना से 15 गुना ज्यादा हीरे मौजूद!

बताया जाता है कि बकस्वाहा जंगल के अलावा पन्ना में भी हीरे के भंडार मौजूद है. यहां करीब 22 लाख कैरेट हीरे हैं. जबकि बकस्वाहा के जंगल में इससे कहीं ज्यादा 3 करोड़ 42 लाख कैरेट हीरे हैं.

ऑक्सीजन चाहिए या हीरे?

देश में जानलेवा कोरोना वायरस की दूसरी लहर में लोग ऑक्सीजन नहीं मिलने की वजह से तड़प तड़प कर मर गए. ऐसे में सवाल उठता है कि हीरे जरूरी हैं या ऑक्सीजन. माना जाता है कि एक साधारण पेड़ चार लोगों को ऑक्सीजन देता है. जबकि एक पीपल का पेड़ 24 घंटे में 600 किलो ऑक्सीजन देता है.

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