शनिदेव के सबसे प्रिय वाहन कौए को है रोगों से मुक्ति का वरदान!

Shani dev Vardaan : सनातन धर्म की मान्यताओं के हिसाब से यूं तो हमारे देवी-देवताओं को किसी एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए साधन या वाहन की जरूरी नहीं होती है. फिर भी 33 कोटि देवी देवताओं ने खुद के लिए किसी न किसी पशु-पक्षी को वाहन बनाया है. जो उनके स्वभाव और संदेश को प्रकट करते हैं.

विष्णुजी गरुड़ की सवारी करते हैं, जबकि शिवजी नंदी बैल की. ब्रह्मा जी का वाहन हंस है तो देवराज इंद्र ऐरावत हाथी की सवारी करते हैं. इसी तरह दुर्गा माता के लिए बाघ की सवारी है तो लक्ष्मी मां ने वाहन के तौर पर उल्लू को चुना. इसके अलावा कई ऐेसे देवी देवता हैं जिनके वाहनों के बारे में प्राय: कम की वर्णन मिलता है.

हंस को ब्रह्माजी, मां सरस्वती ने बनाया वाहन
विद्या की देवी मां सरस्वती सफेद हंस पर विराजती हैं. हंस में तमाम खूबियां हैं, जैसे वह एक ही हंसनी संग जीवन भर रहता है. कुबेर शिवजी के भक्त थे. उनकी कृपा से कुबेर के पास सोने की लंका और पुष्पक विमान होता था, जिसे रावण ने छीन लिया. मत्स्य पुराण के हिसाब से कुबेर की सवारी नर है. जो दर्शाता है कि मनुष्य को पैसे-समृद्धि अपने वश में रखती है.

गणेशजी ने चूहा तो भैरवदेव ने कुत्ते को बनाई सवारी
गजानन गणेश ने चूहे को वाहन बनाया तो भैरवदेव ने कुत्ते को सवारी चुना. कहा जाता है कि कुत्ता पास रखने से मनुष्य आकस्मिक मृत्यु से बचा रहता है. काला कुत्ता भैरव रूप माना गया है.

अग्रिदेव ने भेड़, कामदेव ने हाथी चुना
अग्रिदेव का सनातन धर्म में जीवन से लेकर मरण तक महत्व है. उनका अस्त्र तलवार है तो उनकी सवारी भेड़. इसी तरह हाथी को कामदेव का वाहन माना जाता है. वैसे कुछ शास्त्रों में कामदेव को तोते पर बैठे हुए भी दिखाया जाता है. इसी तरह वायु के देवता पवन देव हिरण को वाहन के तौर पर उपयोग करते हैं. 

किवदंतियों ने रचा कौए का सच
कौवा पितरों के आश्रय स्थल के रूप में भी चिन्हित है, उसकी खूबियों के कारण ही शनिदेव ने उसे वरदान दे रखा है कि वह कभी भी किसी बीमारी के चलते नहीं मर सकता, उसकी मृत्यु सिर्फ आकस्मिक दशाओं में हो सकती है. कालांतर में भी इस किवदंती को काफी बल मिला है, जिसमें पाया गया है कि कौआ अपने पूरे जीवन काल में लगभग रोगमुक्त बना रहता है.

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