CJI रमण ने कहा, यह एक मिथक है कि ‘‘न्यायाधीश ही न्यायाधीशों को नियुक्त कर रहे हैं’’

CJI on Appointment of Judges: भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) एन वी रमण ने रविवार को कहा कि यह धारणा एक मिथक है कि ‘‘न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति कर रहे हैं’’, क्योंकि न्यायपालिका, न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया में शामिल कई हितधारकों में से महज एक हितधारक है.

न्यायमूर्ति रमण ने यह बात विजयवाड़ा स्थित सिद्धार्थ विधि महाविद्यालय में पांचवें श्री लवु वेंकेटवरलु धर्मार्थ व्याख्यान में ‘‘भारतीय न्यायपालिका- भविष्य की चुनौतियां’’ विषय पर बोलते हुए कही. सीजेआई ने कहा कि हाल के दिनों में न्यायिक अधिकारियों पर शारीरिक हमले बढ़े हैं और कई बार अनुकूल फैसला नहीं आने पर कुछ पक्षकार प्रिंट और सोशल मीडिया पर न्यायाधीशों के खिलाफ अभियान चलाते हैं और ये हमले ‘‘प्रायोजित और समकालिक’ प्रतीत होते हैं.

उन्होंने कहा कि लोक अभियोजकों के संस्थान को स्वतंत्र करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि उन्हें पूर्ण आजादी दी जानी चाहिए और उन्हें केवल अदालतों के प्रति जवाबदेह बनाने की जरूरत है. न्यायमूर्ति रमण ने कहा, ‘‘इन दिनों ‘‘न्यायाधीश खुद न्यायाधीशों की नियुक्ति कर रहे हैं’’ जैसे जुमलों को दोहराना चलन हो गया है. मेरा मनाना है कि यह बड़े पैमाने पर फैलाए जाने वाले मिथकों में से एक है. तथ्य यह है कि न्यायपालिका इस प्रक्रिया में शामिल कई हितधारकों में से महज एक हितधारक है.’’

केरल से सांसद जॉन ब्रिट्टस ने उठाया था सवाल

उल्लेखनीय है कि हाल में केरल से सांसद जॉन ब्रिट्टस ने उच्च और उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीश (वेतन और सेवा शर्त) संशोधन विधयेक-2021 पर चर्चा के दौरान संसद में कथित तौर पर कहा था कि न्यायाधीशों के ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की बात दुनिया के कहीं सुनाई नहीं देती.

न्यायमूर्ति रमण ने कहा, ‘‘कई प्राधिकारी इस प्रक्रिया में शामिल हैं, जिनमें केंद्रीय कानून मंत्रालय, राज्य सरकार, राज्यपाल, उच्च न्यायालय का कॉलेजियम, खुफिया ब्यूरो और अंतत: शीर्ष में कार्यकारी शामिल है, जिनकी जिम्मेदारी उम्मीदवार की योग्यता को परखने की है. मैं यह देखकर कर दुखी हूं कि जानकार व्यक्ति भी यह धारणा फैला रहा है. आखिरकार यह कथानक एक वर्ग को अनुकूल लगता है.’’

उन्होंने अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति करने की कोशिश को लेकर केंद्र सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि उच्च न्यायालयों द्वारा की गई कुछ नामों की अनुशंसा को अब भी केंद्रीय कानून मंत्रालय की ओर से उच्चतम न्यायालय भेजा जाना है. उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार मलिक मजहर मामले में तय समयसीमा का अनुपालन करेगी.

सीजेआई ने कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों, खासतौर पर विशेष एजेंसियों को न्यायपालिक पर हो रहे दुर्भावनापूर्ण हमलों से निपटना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब तक न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करता और आदेश पारित नहीं करता, तब तक आमतौर पर अधिकारी जांच की प्रक्रिया शुरू नहीं करते.

ऐसा महौल बनाया जाए की जज कर सके बिना भय के काम

न्यायमूर्ति रमण ने कहा, ‘‘सरकार से उम्मीद की जाती है और उसका यह कर्तव्य है कि वह सुरक्षित माहौल बनाए ताकि न्यायाधीश और न्यायिक अधिकारी बिना भय के काम कर सके.’’ उन्होंने कहा कि मीडिया के नए माध्यमों के पास जानकारी फैलाने की बहुत अधिक क्षमता है लेकिन ऐसा लगता है कि वह सही और गलत, अच्छे और बुरे, वास्तविक और फर्जी के बीच अंतर करने में अक्षम है. मामलों में फैसला तय करने में ‘मीडिया ट्रायल’ निर्देशित करने वाला तथ्य नहीं होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से भारत में अभियोजक सरकार के नियंत्रण में रहते हैं. सीजेआई ने कहा, ‘‘इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि वे स्वतत्रं रूप से कार्य नहीं करते. वे कमजोर और अनुपयोगी मामलों को अदालतों तक पहुंचने से रोकने के लिए कुछ नहीं करते. लोक अभियोजक अपने विवेक का इस्तेमाल किए बिना स्वत: ही जमानत अर्जी का विरोध करते हैं. वे सुनवाई के दौरान तथ्यों को दबाते हैं ताकि उसका लाभ आरोपी को मिले.’’’

पूरी प्रक्रिया में थोड़ा परिवर्तन की जरूरत

उन्होंने सुझाव दिया कि पूरी प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन के लिए काम करने की जरूरत है. लोक अभियोजकों को बाहरी प्रभाव से बचाने के लिए उनकी नियुक्ति के लिए स्वतंत्र चयन समिति का गठन किया जा सकता है. अन्य न्यायाधिकार क्षेत्रों का तुलानात्मक अध्ययन कर सबसे बेहतरीन तरीके को अंगीकार किया जाना चाहिए.

सीजेआई ने कहा कि कानून बनाने के दौरान कानून निर्माताओं को उसकी वजह से उत्पन्न समस्याओं के प्रभावी समाधान के बारे में भी सोचना चाहिए और ऐसा लगता है कि इस सिद्धांत को नजरअंदाज किया जा रहा है. उन्होंने बिहार मद्य निषेद कानून, 2016 का हवाला दिया, जिसकी वजह से उच्च न्यायालय में जमानत अर्जियों की बाढ़ आ गई। सीजेआई ने कहा कि कानून बनाने में दूरदर्शिता की कमी के कारण अदालतों में सीधे तौर पर रुकावट आ सकती है.

 

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